आओ हमें ठगो
Thursday, December 31st, 2009ठगो खूब ठगो। हमारी तो नियति ही ठगे जाना है। जन्म से लेकर मरने तक कदम-कदम पर ठगे ही तो जा रहे हैं। इस नेक काम में तुम ही पीछे क्या रहते हो।जो ज्योतिष अपने भविष्य के बारे में नहीं जानते, वे हमारे भविष्य को उज्जवल करने के नाम पर ठग रहे हैं। कोई हाथ की लकीरें देख रहा है तो कोई ताश के पत्तों से भविष्य बांच रहा है। हम खुश हैं। उनके पास बार-बार जा रहे हैं।

